29 नवंबर को है काल भैरव अष्टमी, महत्व भी जानिए

अध्‍यात्‍म

 

काल भैरव अष्टमी 29 नवंबर को मनाई जाएगी। शिव पुराण के मुताबिक, मार्गशीर्ष जिसे अगहन का महीना भी कहते हैं कृष्ण पक्ष की अष्टमी को काल भैरव की जयंती मनाई जाती है। काल भैरव भगवान शिव के दूसरे रूप हैं। अहगन माह की कृष्णाष्टमी को दोपहर के समय भगवान शंकर के अंश काल भैरव का जन्म हुआ था। काल भैरव अष्टमी तंत्र साधना के लिए अति उत्तम मानी जाती है। इस पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है।

भैरव साधना का महत्व

  • शिव पुराण में कहा गया है कि काल भैरव शंकर के ही रूप हैं और कालाष्टमी के दिन पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता।

  • काल भैरव भगवान शिव के अंश होने के कारण भैरव अष्टमी पर बाबा भैरव की पूजा करने से सारे कष्ट मिट जाते हैं और जाने-अनजाने में हुए सारे पापों से मुक्ति मिल जाती है।

  • ऐसी मान्यता है काल भैरव की पूजा करने और व्रत रखने से सभी प्रकार की बाधाओं से मुक्ति मिल जाती है और साथ ही भूत-पिशाच का कभी डर नहीं रहता है। इस दिन काल भैरव को खुश करने के लिए काले कुत्ते को रोटी जरूर खिलानी चाहिए।

  • यदि आप बाबा काल भैरव की कृपा चाहते हैं तो अष्टमी के दिन बाबा काल भैरव के मंदिर में जाकर उनकी प्रतिमा पर सिंदूर और तेल चढ़ाएं और मूर्ति के सामने बैठकर काल भैरव मंत्र का जाप करें।

  • बाबा काल भैरव की उत्पत्ति भगवान शिव के अंश के रूप में हुई थी। इसलिए इस दिन 21 बिल्वपत्रों पर चंदन से ऊं नम: शिवाय लिखकर शिवलिंग पर चढ़ाएं। ऐसा करने से सभी तरह की मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

  • भैरव आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय प्राप्त होती है। व्यक्ति में साहस का संचार होता है। इनकी आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। रविवार और मंगलवार के दिन इनकी पूजा बहुत फलदायी है।

  • भैरव जी का बहुत महत्व है। यह दिशाओं के रक्षक और काशी के संरक्षक कहे जाते हैं। काल भैरव की शरण में जाने से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।

  • ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति काशी में मृत्यु को प्राप्त करता है उसके पापों का भोग काल भैरव सोटे से पीटकर पूरा करते हैं। इस क्रिया को भैरव यातना कहा जाता है।

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